- डॉ. प्रियंका सौरभ
JNN: समाज में कुछ धारणाएँ इतनी गहरी पैठ बना लेती हैं कि वे सवालों से परे सत्य मान ली जाती हैं। “अध्यापिका की नौकरी तो सबसे आराम की है”—यह वाक्य भी ऐसी ही एक सामाजिक मान्यता है, जिसे दोहराते हुए लोग शायद कभी ठहरकर यह नहीं सोचते कि इसके पीछे कितनी अधूरी समझ और कितनी गहरी उपेक्षा छिपी है। महिला शिक्षिका का जीवन इस धारणा का सबसे सशक्त, लेकिन सबसे कम सुना गया प्रतिवाद है।
एक महिला शिक्षिका का दिन अलार्म की आवाज़ से नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारियों की सूची से शुरू होता है। घर के बाकी सदस्य अभी नींद में होते हैं, तब वह चाय चढ़ा रही होती है, टिफ़िन पैक कर रही होती है, बच्चों को जगा रही होती है और यह सुनिश्चित कर रही होती है कि रसोई में कुछ भी अधूरा न रह जाए। उसके लिए सुबह की तैयारी केवल खुद को तैयार करना नहीं, बल्कि पूरे घर को “चलने लायक” बनाना है। इसके बाद वह अपने पेशेवर चेहरे के साथ घर से निकलती है, लेकिन उसकी चिंताएँ दरवाज़े पर रुकती नहीं हैं। गैस बंद हुई या नहीं, गीजर का स्विच ऑफ है या नहीं—ये सवाल बस या ऑटो की भीड़ में भी उसके साथ चलते हैं।
विद्यालय पहुँचते ही उससे अपेक्षा की जाती है कि वह पूर्णतः एक “आदर्श शिक्षिका” में बदल जाए। उसकी घरेलू थकान, निजी उलझनें और भावनात्मक दबाव—सबको जैसे विद्यालय के गेट पर ही छोड़ देना अनिवार्य है। वहाँ उसे मुस्कुराना है, संयमित रहना है, बच्चों के सवालों का धैर्यपूर्वक उत्तर देना है और हर परिस्थिति में खुद को संतुलित दिखाना है। यह भावनात्मक श्रम, जिसे न वेतन पर्ची में गिना जाता है और न ही किसी मूल्यांकन में, उसकी नौकरी का सबसे भारी और सबसे अदृश्य हिस्सा है।
विडंबना यह है कि विद्यालय के भीतर भी समानता का दावा अक्सर अधूरा साबित होता है। खाली पीरियड, जिसे आराम या आत्मविकास का समय माना जाना चाहिए, महिला शिक्षिका के लिए प्रायः कॉपियों के ढेर, रिकॉर्ड्स की फाइलें और अतिरिक्त जिम्मेदारियों में बदल जाता है। दूसरी ओर, यही समय कई पुरुष सहकर्मियों के लिए अनौपचारिक चर्चाओं, चाय की चुस्कियों या विश्राम का अवसर बन जाता है। यह अंतर किसी लिखित नियम में दर्ज नहीं है, लेकिन व्यवहार में गहराई से मौजूद है।
शाम को जब वह घर लौटती है, तो उसकी दूसरी पारी शुरू होती है। अब वह शिक्षिका नहीं, बल्कि रसोइया, देखभालकर्ता, प्रबंधक और हर समस्या की समाधानकर्ता बन जाती है। उसके कंधे पर बैग का बोझ और हाथों में सब्ज़ियों की थैलियाँ होती हैं, लेकिन उससे अपेक्षा की जाती है कि चेहरे पर थकान की एक रेखा भी न दिखे।
क्योंकि अगर थकान दिखी, तो ताना तैयार है—
“कहा था न, तुमसे नहीं हो पाएगा।”
सबसे पीड़ादायक क्षण तब आता है, जब वह कभी अपने बोझ को शब्दों में ढालने की कोशिश करती है। “अगर इतनी दिक्कत है तो नौकरी छोड़ क्यों नहीं देती?” यह वाक्य सुनने में भले ही साधारण लगे, लेकिन इसके भीतर स्त्री की शिक्षा, उसकी महत्वाकांक्षा और उसके आत्मसम्मान का गहरा अवमूल्यन छिपा है। यह मान लिया जाता है कि उसकी नौकरी एक विकल्प है, एक शौक है, जिसे वह चाहे तो छोड़ सकती है।bयह भुला दिया जाता है कि उसकी डिग्रियाँ—एम.ए., बी.एड. और उनके पीछे की रात-रात भर की मेहनत—सिर्फ़ सजावट नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व और पहचान का हिस्सा हैं।
यह प्रश्न भी उतना ही ज़रूरी है कि क्या आज भी एक महिला की उच्च शिक्षा को केवल “अच्छी शादी” और “संस्कारवान बच्चों” तक सीमित करके देखा जाएगा? क्या उसकी बौद्धिक क्षमता और पेशेवर योगदान का मूल्य केवल तब तक है, जब तक वह पारिवारिक अपेक्षाओं से टकराता नहीं? ये सवाल केवल शिक्षिकाओं के नहीं, पूरे समाज के हैं।
आज के आर्थिक यथार्थ में महिला शिक्षिका की नौकरी कोई विलासिता नहीं है। बढ़ती महँगाई, ईएमआई, बच्चों की स्कूल फीस और स्वास्थ्य खर्च—इन सबके बीच उसका वेतन परिवार की रीढ़ बन चुका है। वह नौकरी इसलिए नहीं करती कि उसे घर से भागना है, बल्कि इसलिए करती है ताकि उसका घर सम्मान और स्थिरता के साथ चल सके।
इसके बावजूद, उसकी कमाई को अक्सर “सहायक आय” कहकर छोटा कर दिया जाता है, मानो उसका योगदान वैकल्पिक हो।
भावनात्मक स्तर पर भी उसका संघर्ष कम नहीं है। सबको समय देने की कोशिश में वह खुद से सबसे ज़्यादा समझौता करती है। बच्चों के प्रोजेक्ट, छात्रों की कॉपियाँ, परिवार की ज़रूरतें और सामाजिक अपेक्षाएँ—इन सबके बीच उसके अपने सपने, उसकी थकान और उसकी इच्छाएँ कहीं पीछे छूट जाती हैं। आईने में झलकते सफ़ेद बाल और आँखों के नीचे के काले घेरे उसे याद दिलाते हैं कि जिस परफेक्शन की दौड़ में वह लगी रही, उसने उसे खुद से दूर कर दिया।
फिर भी, अगली सुबह अलार्म बजते ही वह फिर उठेगी।
यह उसकी विवशता भर नहीं, उसकी ताकत भी है।
लेकिन इस ताकत को स्वाभाविक मान लेना सबसे बड़ी भूल है। समाज को यह समझना होगा कि महिला शिक्षिका का धैर्य असीम नहीं है और उसका समर्पण शोषण का आधार नहीं बन सकता।
यह संपादकीय किसी एक शिक्षिका की कहानी नहीं, बल्कि लाखों महिलाओं की सामूहिक गाथा है। यह एक आह्वान है—नीतिनिर्माताओं, शैक्षणिक संस्थानों, परिवारों और स्वयं समाज से—कि वे महिला शिक्षिकाओं के श्रम को सिर्फ़ स्वीकार ही न करें, बल्कि उसका सम्मान भी करें। सहायक नीतियाँ, समान कार्य-वितरण और सबसे बढ़कर संवेदनशील दृष्टि विकसित करना आज की अनिवार्य आवश्यकता है।
अंततः, शिक्षिका वह नींव है जिस पर पीढ़ियाँ खड़ी होती हैं।
अगर वही नींव थकी हुई, उपेक्षित और अनसुनी रहेगी, तो समाज की इमारत कैसे मजबूत होगी? यह समय है कि हम शिक्षिकाओं को केवल “समर्पित” कहकर आगे न बढ़ जाएँ, बल्कि उनके जीवन की वास्तविकताओं को समझें—और उन्हें वह सम्मान दें, जिसकी वे वास्तव में हक़दार हैं।

